मानव धर्म

पोस्ट संख्या-55 
मानव धर्म अमोल है ,बाँटे जग में प्यार

मानव धर्म अमोल है ,बाँटे जग में प्यार।
सर्वधर्म सद्भाव का, करता रहे प्रचार।।

अकाल पुरख परमेश्वर,रामकृष्ण अवतार।
सबका ही फरमान है,मत करना तकरार।।

हिन्दू,मुस्लिम, सिक्ख में, खड़ी न हो दीवार।
मानवता की नींव पर ,बसा रहे संसार।।

मेरा मुझमें कुछ नहीं ,सब तेरा दातार।
तन-मन-धन को सौंप कर,मिलेगा निरंकार।।

सेवक-सेव्य भाव से,भवसागर हो पार।
ईश रूप हर भक्त का , करें सदा सत्कार।।

मिलवर्तन औ' स्नेह से,फैले मानव धर्म।
स्वार्थ लोभ अभिमान से ,समझ न आये मर्म।।

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