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राधा अष्टमी व्रत का महत्व

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  राधा अष्टमी व्रत (आलेख) राधा अष्टमी के व्रत में भक्तगण उपवास रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन राधा रानी के जन्मोत्सव पर सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है, स्वच्छ (अथवा पीले रंग के) वस्त्र धारण किए जाते हैं और घर के मंदिर अथवा पूजा स्थल को साफ किया जाता है। राधा-कृष्ण की मूर्ति स्थापित कर उसे पंचामृत से स्नान कराना, फूल, रोली, चंदन, अक्षत, पुष्पमाला, तुलसी दल आदि अर्पित करना परंपरा है। पीले या गुलाबी वस्त्र, आभूषण, इत्र, मोर पंख, बांसुरी और सोलह श्रृंगार की सामग्री राधा रानी को अर्पित की जाती है। घर में माखन-मिश्री, खीर, फल और मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है। व्रत की विशेषताएँ व्रती प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करके राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं। पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर) से मूर्ति का अभिषेक किया जाता है। सुहागिनें सोलह श्रृंगार की सामग्री व लाल चुनरी राधारानी को पहनाती हैं। भोग में माखन-मिश्री, खीर, मिठाई आदि रखते हैं। राधा-कृष्ण मंत्रों (जैसे 'श्री राधा-कृष्णाय नमः' ...

तीन दिवसीय बीआरसी कार्यशाला बाखूबी हुई संपन्न : डाइट वेरका,अमृतसर

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  तीन दिवसीय बीआरसी कार्यशाला बाखूबी  हुई संपन्न : डाइट वेरका,अमृतसर  सहायक निदेशक डॉ शंकर चौधरी द्वारा प्रेरक वक्तव्य  डॉ राजन डीआरसी को सम्मानित करते जिला शिक्षाधिकारी श्री राजेश कुमार शर्मा, उप जिला शिक्षाधिकारी श्री राजेश खन्ना, डाईट प्रिंसिपल स.सुखदेव सिंह, प्रिंसिपल कैमरों, तरनतारन एवं अन्य  जिला शिक्षाधिकारी श्री राजेश कुमार शर्मा जी द्वारा बीआरसी  को शैक्षणिक कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाने हेतु प्रेरित करने का दृश्य  स्टेट कौंसिल ऑफ़ एज्युकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग, पंजाब के दिशा निर्देश से सिंपल एजुकेशन फाऊंडेशन के सहयोग से अकादमिक सहायता ग्रुप तहत तीन दिवसीय बीआरसी इंडक्शन ट्रेनिंग (प्राइमरी एवं अपर प्राइमरी )जिला अमृतसर और तरनतारन के सामूहिक बीआरसी की ट्रेनिंग डाइट वेरका,अमृतसर में 11 सितंबर से 13 सितंबर तक आयोजित की गई। एनसीईआरटी डायरेक्टर डॉ. किरण शर्मा द्वारा सेमिनार के प्रथम दिन 11 सितंबर को ऑनलाइन माध्यम से अलग-अलग जिलों में करवाई जा रही ट्रेनिंग के आरंभिक आगाज दौरान ट्रेनिंग में उपस्थित बीआरसी/डीआरसी को संबोधन किया गया और उनको अपने का...

पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन by Dr Purnima Rai

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पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन by  Dr Purnima Rai रक्षा बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार। दिवस 'पूर्णिमा' कर सजे,रक्षाबंधन तार।। आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तो को मजबूती प्रदान करने का पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय समाज में व्यापकता और गहराई से समाए हुए इस पर्व के दिन लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली सजाकर अपने भाई को राखी बांधने के लिए जाती है ।अभीष्ट देवता की पूजा करने के बाद रोलिया हल्दी का टीका लगाकर भाई की आरती उतारती है और दाहिनी कलाई पर राखी बांधती हैं ।इसके बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन लेता है और उसे उपहार में कोई धनराशि या कोई अमूल्य वस्तु प्रदान करता है। रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके । शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके। राखी के रंग-बिरंगे धागे बहन-भाई के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करते हैं ।बहन-भाई के प्रेम का सूचक यह त्यौहार देशकाल, भाषा-जाति की सीमाओं से परे गुरु- शिष्य कि रिश्ते को भी राखी के पवित्र धागों में बांधता है। कहते हैं जब कभी शिष्य गुरुकुल से शिक्षा लेकर विदा होता था तो शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद पाने के लिए अ...

स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है

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स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है  अंध श्रद्धा को भक्ति एवं धर्म का नाम देना उचित नहीं।धर्म यह भी नहीं कि भेड़चाल की तरह यां पारिवारिक संस्कारों में मिली धार्मिक विरासत के आगे बिना सोचे समझे ,जाने बगैर मस्तक झुकाओ और घुटने टेक दो।ठप्पा लगा..कहाँ है ठप्पा...आमिर खान की फिल्म "ओ माय गॉड" में बेबाकी से धार्मिकता पर किया आक्षेप आज के संदर्भ में कितना उचित था यां अनुचित ...सोचने का प्रश्नहै।पर तब भी विवाद हुआ ..लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँची ...कहकर आक्षेप लगे।सदैव देर बाद ही बात समझ आती है शायद भोले भाले लोगों को,समाज के नेताओं को ,सरकारों को,,धर्म के ठेकेदारों को ..तभी तो 15 साल बाद किसी निर्णय पर पहुँचे।यहाँ मुद्दा किसी धर्म गुरु का,नेता का,प्रशासन का,व्यवस्था का यां प्रबुद्ध वर्ग यां सामान्य जन का ...किसी का भी हो ...शीघ्र स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है ..तभी तो आगजनी,हिंसा,पथराव,.मृत्यु का तांडव न जाने क्या क्या ......देखती है आँखें...और दुखी होती है साफ आत्मायें!!  स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है सब....अगर हम कहें कि सब एक जैसे हैं तो यह धारणा गल्त होगी।साधारण तौर पर किसी एक के कु...

सेल्फी और सेल्फ(डॉ.पूर्णिमा राय)

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सेल्फी और सेल्फ आधुनिक स्मार्टफोन युग में दूसरों के समक्ष अपने सेल्फ के बाह्य रूप को प्रस्तुत करने का प्रस्फुटन सेल्फी है।मैं क्या हूँ और क्या दिखाना चाहता हूँ ?मैं कैसा हूँ और कैसा दिखता हूँ?इसी ऊहापोह में एवं एकान्त जीवन की घुटन में बाहरी अपनेपन और खुशी तथा आनंद के पलों को खोजते-खोजते मानव इतना मशीनी हो गया कि उसे इन्सानों से अधिक मोबाइल एवं इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों - ------- फेसबुक,वात्सैप,इनस्टाग्राम इत्यादि से अत्यधिक लगाव हो गया।ये लगाव एक सीमा तक जहाँ आनंददायक था,वहीं सीमा के अतिक्रमण होने पर यह मानव की असमय मौत का साधन भी बन गया। हिंदुस्तान की आबादी 133 करोड़ के आस पास आ चुकी है और देश में मोबाइल की संख्या भी इसी के आस-पास है । देश में इस समय लगभग 120 करोड़ मोबाइल लोग का प्रयोग कर रहे हैं।लगभग 9.30 करोड़ सेल्फी हर दिन दुनिया में ली जाती है । भारत में ही नहीं हर देश में इसका प्रचलन खूब हो रहा है आज चहुँ ओर नजर दौड़ायें तो सेल्फी की भरमार ही नजर आ रही है। एक सर्वे केअनुसार पुरुष 20 सेकेंड से ज्यादा समय के लिये भी मोबाईल से दूर नहीं रह सकते। परन्तु महिलाओं की स्थिति इस मामले में...

बारिश (हास्य व्यंग्य)

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बारिश (हास्य व्यंग्य) असमता के पाटों के बीच, पिसता जीवन करे गुहार बारिश की बूँदों से टपके,दर्द टीस और हाहाकार!! न जाने क्यों ?लोग यह नहीं सोचते कि हमारा इस तरह का बर्ताव एक तो हमारे खुद के लिये हानिकारक है और दूसरा अन्य व्यक्तियों को ,भी इससे नुक्सान होगा।सड़कें कच्ची थी !नहीं, नहीं,पक्की थी ।अपने ऊँचें घरों को अन्य लोगों के घरों से श्रेष्ठ सिद्ध करने की लालसा ,चाहना ने पक्की सड़क को मिट्टी से ढककर कच्चा बना दिया था।पानी का पाईप बाहर खुली सड़क पर ओवरफ्लो होता, टैंकी भरने पर पानी कभी किसी राही को नहला देता,तो कभी किसी गुज़रती गाड़ी को नहला देता। कहीं झगड़ा न हो जाये,दो चार बार पुलिस भी आ चुकी थी।अब जिसको मुश्किल लगती ,वह खुद बात करे ,औरों को क्या।सबको अपना गेट साफ चाहिये था।हाँ ,भई  साफ-सफाई घर की तो होनी ही चाहिये ।गली-मुहल्ले का रास्ता कीचड़ सना रहे ,हमें क्या!हम तो पैंट टाँग कर जूते हाथ में पकड़ कर निकल ही जायेंगे ।वैसे बलि का बकरा कौन बने! ना जी,हम तो दूसरों के खाली पड़े प्लाट से ईंटें चोरी कर सकते हैं,मिट्टी उठाकर घर का आँगन ऊँचा कर सकते हैं ,हमसे तो न होगा ,किसी को जाकर कहना कि अपना प...

पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन by Dr Purnima Rai

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  पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन  रक्षा बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार। दिवस 'पूर्णिमा' कर सजे,रक्षाबंधन तार।। आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तो को मजबूती प्रदान करने का पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय समाज में व्यापकता और गहराई से समाए हुए इस पर के दिन लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली सजाकर अपने भाई को राखी बांधने के लिए जाती है ।अभीष्ट देवता की पूजा करने के बाद रोलिया हल्दी का टीका लगाकर भाई की आरती उतारती है और दाहिनी कलाई पर राखी बांधती हैं ।इसके बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन लेता है और उसे उपहार में कोई धनराशि या कोई अमूल्य वस्तु प्रदान करता है। रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके । शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके। राखी के रंग-बिरंगे धागे बहन-भाई के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करते हैं ।बहन-भाई के प्रेम का सूचक यह त्यौहार देशकाल, भाषा-जाति की सीमाओं से परे गुरु- शिष्य कि रिश्ते को भी राखी के पवित्र धागों में बांधता है। कहते हैं जब कभी शिष्य गुरुकुल से शिक्षा लेकर विदा होता था तो शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद पाने के लिए अपने आचार्य को राख...

बुजुर्ग :समाज का सशक्त आधार

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बुजुर्ग :समाज का सशक्त आधार बुजुर्गों का आदर-सम्मान करना हमारी उच्चकोटि की भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। बुजुर्ग घर-परिवार,समाज देश व राष्ट्र की नींव का सशक्त आधार हैं जिनके महत्तव को अनदेखा करना अपने आपको भीतर से खोखला करने के समान होगा ।बुजुर्ग शब्द को एक सीमित परिधि जैसे कमजोर शरीर ,बेकार ,व्यर्थ का बोझ, फालतू सिर खाने वाला,निकम्मा ,निठल्ला आदि संबोधनों से संबंधित मानकर ही स्वीकारना ,समाज की संकीर्ण मानसिकता का उद्घाटन है,जोकि उचित नहीं है।। बुजुर्ग शब्द के साथ ही हमारे मानसपटल पर एक ऐसी छवि अंकित होने लगती है जिसने अपने जीवन में उम्र के साथ-साथअनेक अनुभव प्राप्त किये हों। हमारी सोच ,हमारा सकारात्मक रवैया बनाने में बुजुर्गों की भूमिका अक्षुण्ण है। बुजुर्ग समाज के अनमोल धरोहर हैं। वें सामाजिक-धार्मिक राजनैतिक व्यवस्था की नींव के मजबूत आधार हैं। वे एक मार्गदर्शक हैं सलाहकार है शिक्षक हैं जो हमें हमेशा विवेकपूर्ण निर्णय करने में सहायता करते हैं क्योंकि उनके अनुभव जीवन का भोगा हुआ यथार्थ सत्य हैं।जीवन की कठिन परिस्थितियों बुजुर्गों के सही निर्देशानुसार हम सुरक्षित स्थान...

नशा पाप का मूल है,करता पाप विनाश

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नशा पाप का मूल है, करता पाप विनाश  आज सबसे बड़ी सामाजिक समस्या मुँह खोले खडी है _युवाओं का नशे के चंगुल में फंसना। श्री गुरु नानक देव जी ने लिखा है__ "भांग मछली सुरापान,जो जो प्राणी खाए। धर्म कर्म सब किये ते,सभी रसातल जाए।।" नशे के सेवन से इंसान का यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।देश के कर्णधार 9० प्रतिशत युवा आज सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं। देश की उन्नति में अपनी उर्जा लगाने के स्थान पर वह अपनी अमूल्य शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य चोरी, लूट-पाट और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में व सामाजिक कुरीतियों में नष्ट कर रहे है। जब से बाजार में गुटका पाउच का प्रचलन हुआ है, तबसे नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग भी गुटका पाउच की चपेट में है। घर -गृहस्थी संभालने वाली नारी भी अब इससे दुष्कर्म से अछूती नहीँ रही। यह अत्यंत दुखद है कि नशा करने वाला हर व्यक्ति जानता है कि नशे की आदत उसके लिए नुकासानदायक है, बावजूद इसके इस प्रवृत्ति में लगातार बढ़ोतरी देखी जा सकती है।       यह ठीक है कि जहाँ तकनीकी विकास हुआ है, वहीं नशे के सेवन मे...

खालसाई ओज का प्रतीक होला महल्ला:एक दृष्टिपात

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 खालसाई ओज का प्रतीक होला महल्ला:एक दृष्टिपात   आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ एक ओर त्योहारों को अनदेखा और नजर अंदाज किया जा रहा है ।वहीं दूसरी ओर लोगों में आपसी सदभाव और मिलनसारिता के भाव धूमिल होने लग गये है।जब भी होली की बात आती है तो एक अजीब सी सिहरन मन, देह ,आत्मा को कंपित कर जाती है ।एक अनोखा सा एहसास मन को उद्वेलित करने लगता है।अकेलेपन की त्रासदी का शिकार जनमानस आनंद के पलों की अनुभूति हेतु व्याकुल होता है।उसके लिए एकमात्र त्योहार ही आनंद के स्रोत हैं ,अब ऐसा नहीं रहा। सामयिक जीवन में लोगों के पास इंटरनेट की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं,लोग आज घरों से तो क्या ..अपने कमरे से बाहर निकलकर अन्य स्थान पर जाने के लिये भी तैयार नहीं,तो फिर हम कैसे होली जैसे पावन ,मादकता पूर्ण ,ऋतुराज के संदेशवाहक फाल्गुन का आनंद उठा सकते हैं  फगुआ,धुलेंडी,फाल्गुनी आदि नामों से सुसज्जित  होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एवं भारतीय संस्कृति का एक मुख्य एवं सुप्रसिद्ध भारतीय त्योहार है।बसंत का संदेशवाहक होली पर्व संगीत और रंग का परिचायक तो है ही,साथ ही प्...

नारी और वक्त by Dr.Purnima Rai

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नारी और वक्त  नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नगपग तल में पीयूष स्रोत सी बहा करो ,जीवन के समतल आँगन में  (जयशंकर प्रसाद,कामायनी) आज औरत अबला नही सबला है,वह पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर पारिवारिक सामाजिक,शैक्षणिक एवं राष्ट्रीय,धार्मिक,साहित्यिक और साँस्कृतिक सभी प्रकार के कर्तव्यों को बाखूबी निभाने लगी है।वह हरेक कार्य जो पुरुष कर सकता है ,वह भी करती है।एकाध अपवाद को छोड़कर पुरुष भी नारी के साथ घरेलू कार्यों में ,अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे हैं ,ऐसा आमतौर पर समाज में विचरते हुये हम अनुभव करते हैं ,अरे सुन,मेरा पति तो सुबह- सुबह चाय भी बनाकर पिलाता है,कपड़े तो वो ही छुट्टी के दिन धोते है , जानती हो --अगर मेरे पति सब्जी न लायें तो मैं कुछ नहीं बनाती--बस जो दाल- वाल घर में हो ,बनाती हूँ ,और तो और मैं तो बस हुक्म चलाती हूँ ---वाहहह, बड़े मज़े हैं तुम सब केआदि बातें जब औरतें खिलखिलाकर करती हैं तो ---तरस भी आता है और जलन भी ?? तरस इसलिये कि क्या ऐसी नारियों को महान कहा जाये ,जो छोटी-छोटी बातों से ,सहेलियों में ढींगें मारकर अपना नारीत्व सिद्ध करती हैं यां उनमें इतनी काबलियत नह...

अनुशासन ,अनुशासनहीनता और विद्यार्थी

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अनुशासन ,अनुशासनहीनता और विद्यार्थी by Dr.Purnima Rai "अनुशासन की नींव पर,टिका हुआ संसार। आस और विश्वास से ,मिले प्रगति आधार।।" ( दोहा, डॉ.पूर्णिमा राय) स्वयं पर नियंत्रण करना,अपने आपको नियम में रखकर जीवन बिताना एवं समाज द्वारा नियत मूल्यों का अनुसरण करना अनुशासन कहलाता है।कहते हैं जब प्रकृति नियम और अनुशासन में रहे तो विकास और अनुशासन टूटे तो विनाश!सूर्य ,पानी ,हवा इत्यादि अगर समय चक्र के साथ नियंत्रण में न रहें तो मानव के लिये जीवन जीना दूभर हो जाता है।व्यक्ति अपनी सीमायें भूल जाये ,मनमर्जी करे तो परिवार बिखर जाते,प्रधानमंत्री जनता के साथ तालमेल न रख पाये तो देश का भविष्य बिगड़ते देर न लगती।यह सब बातें अनुशासनहीनता से बचने के लिये ही कही जा रही हैं।साधारण शब्दों में अनुशासन में न रहना ही अनुशासनहीनता है। नित नूतन हो रहे परिवर्तन के तहत आज जहाँ एक ओर घर परिवार,समाज ,देश,राष्ट्र और विश्व बदला है,वहाँ व्यक्ति के स्वभाव में बदलाव न आये ,यह कैसे असंभव था। एक तरफ सफलता के शिखर को छात्र छू रहें हैं तो दूसरी ओर विनाश के गर्त में गिरते विद्यार्थी समाज एवं परिवार के लिये चिन्ता का विष...

अखबार की कहानी अखबार की ज़ुबानी

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 अखबार की कहानी अखबार की ज़ुबानी हर सुबह चौंक में एक बड़ी गाड़ी आती है ,जहाँ बहुत से लोग प्रतीक्षा करते हैं...मेरी नहीं !!गंतव्य स्थान पर ले जाने वाली बस,मोटरगाड़ी की!!क्यों ,क्या हुआ?आपको !!यह सुनकर !!कोई था एक जो बेसब्री से मेरा इंतजार करता था ---पढ़ने के लिये नहीं ,जनाब!मुझे बंडल में बाँधकर बेचने के लिये!!उनींदी आँखों में रंग बिरंगे सपने लिये वह हॉकर (अखबार बाँटने वाला)साढे चार बजे मुझे प्राप्त करके गठरी बाँधकर जिस जोश और उत्साह से साइकिल पर जैसे-जैसे पैडल मारता है,वैसे ही मेरे मन का अहम् जाग जाता ।और साइकिल के कैरियर पर लदा हुआ मैं इतना खुश होता कि आज तो मैं दूसरे अखबार को पछाड़ कर सबसे ऊपरी सिंहासन पर सुसज्जित हूँ।पर आह !कितना दर्द !उस रस्सी का सहन किया जो बड़ी मजबूती से मुझे जकड़े हुई थी ! अभी यह सोच ही रहा था कि हॉकर ने झटके से रस्सी खोली और मुझे छोड़कर अन्य अखबार को सबसे पहले बुजुर्ग मीर साहिब जो एक जमाने में अफसर थे,उनके दरवाजे से धड़म से पार करते हुये आँगन में पटक दिया। भई,हम ठहरे ,आज के अखबार जो अभी अपनी अहमियत सिद्ध करने में लगे हुये हैं!वह अखबार जो प्रसिद्ध हैं ,वह कहाँ फटकने ...

हिन्दी भाषा : भावात्मक एकता की आधारशिला (14 सितंबर हिंदी दिवस विशेष )

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  हिन्दी भाषा : भावात्मक एकता की आधारशिला   (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर ) किसी राष्ट्र की एकता व संस्कृति के शक्तिशाली बनने का माध्यम भाषा है। भाषा के उत्थान एवं प्रचार में ही पूरे राष्ट्र का कल्याण समाहित है।मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के सन् 1998 ई. के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार हिन्दी को तीसरा स्थान दिया गया।सन् 1997 में सैन्सस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषा ओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन्1998 में यूनेस्को प्रश्नावली भारतीय सरकार के केंद्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफैसर महावीर सरन जैन को भेजी गई।जिस आधार पर यह विश्व स्तर पर स्वीकार्य है कि मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से हिन्दी का स्थान संसार की भाषाओं में द्वितीय है। * * * * * * * * * * * चमके है बिंदी सदा ,सुन्दर भाल नारी के  बनी देश भारत की,पहचान हिंदी से।। * * * * * * * * * * * विश्व के लगभग 20वीं शती के अंतिम दो द...

रक्षाबंधन आ गया बहना का ले प्यार -डॉ पूर्णिमा राय

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रक्षाबंधन आ गया बहना का ले प्यार -डॉ पूर्णिमा राय रक्षा-बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार। दिवस 'पूर्णिमा' कर सजे, रक्षाबंधन तार।। आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय समाज में व्यापकता और गहराई से समाए हुए इस पर के दिन लड़कियाँ और महिलाएँ पूजा की थाली सजाकर अपने भाई को राखी बाँधने के लिए जाती है। अभीष्ट देवता की पूजा करने के बाद रोली या हल्दी का टीका लगाकर भाई की आरती उतारती है और दाहिनी कलाई पर राखी बाँधती हैं। इसके बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन लेता है और उसे उपहार में कोई धनराशि या कोई अमूल्य वस्तु प्रदान करता है। रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके । शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके। राखी के रंग-बिरंगे धागे बहन-भाई के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करते हैं। बहन-भाई के प्रेम का सूचक यह त्यौहार देशकाल, भाषा-जाति की सीमाओं से परे गुरु- शिष्य कि रिश्ते को भी राखी के पवित्र धागों में बाँधता है। कहते हैं जब कभी शिष्य गुरुकुल से शिक्षा लेकर विदा होता था तो शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद पाने के लिए ...

समाज का आईना पुस्तकें : लाइब्रेरी लंगर एक झलक

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समाज का आईना पुस्तकें : लाइब्रेरी लंगर एक झलक   (डॉ पूर्णिमा राय) पुस्तकों का महत्व अक्षुण्ण है।  पुस्तकें समाज का आईना हैं।पुस्तकों में एक कवि, लेखक ,साहित्यकार अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के साथ-साथ समाज को पथ भ्रमित होने से बचाने के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका का निर्वहन भी करता है ।जब मन में भावनाओं का सागर उमड़ता है तो वह शब्दों के रूप में कागज पर अंकित कर दिया जाता है और फिर वह शब्द प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक अर्थ को ध्वनित करते हैं ।गहनता से समझने वाला पाठक तो पुस्तक में छपे शब्दों के अर्थ को आसानी से समझ लेता है पर जो पाठक गहराई से शब्दों के अर्थ को नहीं समझ पाता, वह महज पुस्तक में सहज रस अनुभूति प्राप्त करके ही अपने आप को आनंदित कर लेता है। सफल लेखक का दायित्व इसी में होता है कि उसने उसकी पुस्तक जन-जन को प्रेरित करे, उसमें संकलित किए गए शब्द ,वाक्य ,घटनाएं ,भावनाएं सदैव समाज की प्राचीनता और समसामयिकता को उजागर करे। पुस्तक का आवरण पृष्ठ देखकर कुछ लोग आकर्षित होते हैं, कुछ लोग पुस्तक का नाम पढ़कर पुस्तक को पढ़ने के लिए लालायित हो जाते हैं, कुछ लोग पुस्तक पर अंकि...

शक्तिपुँज श्री गुरु गोबिंद सिंह जी by Dr.Purnima Rai

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शक्तिपुँज श्री गुरु गोबिंद सिंह जी (डॉ.पूर्णिमा राय )  22 दिसंबर, सन् 1666 को पटना साहिब में नवम् पातशाही गुरु तेग़बहादुर जी की धर्मपत्नी माता गुजरी के घर जन्मे सुंदर बालक गुरु गोबिन्द सिंह जी खिलौनों से खेलने की उम्र में कृपाण, कटार और धनुष-बाण से खेलना पसंद करते थे। बहुभाषाविद गुरु गोबिंद सिंह जी को फ़ारसी अरबी, संस्कृत और अपनी मातृभाषा पंजाबी का ज्ञान था। उन्होंने सिक्ख क़ानून को सूत्रबद्ध किया, काव्य रचना की और सिक्ख ग्रंथ 'दशम ग्रंथ' लिखकर प्रसिद्धि पाई। दशम गुरु गोबिन्द सिंह जी उस युग की आतंकवादी शक्तियों का नाश करने तथा धर्म एवं न्याय की प्रतिष्ठा के लिए गुरु तेग़बहादुर सिंह जी के यहाँ अवतरित हुए। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था--- "मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना करने के लिए भेजा है।" गुरु गोबिंद सिंह को ज्ञान, सैन्य क्षमता और दूरदृष्टि का सम्मिश्रण माना जाता है।गुरु गोबिन्द सिंह ने सिक्खों में युद्ध का उत्साह बढ़ाने के लिए वीर काव्य और संगीत का सृजन किया था। खालसा को पुर्नसंगठित सिक्ख सेना का मार्गदर्शक बनाकर, उन्होंन...