समकालीन कवयित्री डाॅ. पूर्णिमा राय के काव्य संग्रह ‘ओस की बूॅंदें’ः बहुआयामी अवलोकन
समकालीन कवयित्री डाॅ. पूर्णिमा राय के काव्य संग्रह ‘ओस की बूॅंदें, बहुआयामी अवलोकन
समकालीन कवयित्री डाॅ. पूर्णिमा राय के काव्य संग्रह ‘ओस की बूॅंदें’ः बहुआयामी अवलोकन
डाॅ. हरिभजन प्रियदर्शी
प्रवक्ता-हिन्दी
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय (कन्या)
मलोट, जिला श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब)
दूरभाषा:- 9876186791
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बहुआयामी प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व की धनी कवयित्री डाॅ. पूर्णिमा राय का समकालीन कवयित्रीयों में विशिष्ट स्थान है। इनका जन्म 28 दिसंबर 1978 को गुरू नगरी श्री अमृतसर साहिब (पंजाब) मंे हुआ। अपनी जीवन यात्रा सरकारी स्कूल में हिन्दी शिक्षा के रूप में शुरू किया। हिन्दी के मर्मज्ञ विदुषी तथा चिन्तनशील प्रवृत्ति ने लेखन कार्य की ओर पे्ररित किया । सामाजिक, राजनैतिक, मानवीय एवं नैतिकता मंे आ रही गिरावट ने कवयित्री के अन्तर्मन को झकझोर कर रख दिया जो इनकी प्रथम काव्य संग्रह ‘ओस की बुंदे’ में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
डाॅ. पूर्णिमा राय का व्यक्तित्व महान व विशाल है परिणामतः इनकी कविताएं व लेख, लघु कथा, विभिन्न पत्र, पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं जिनमें कानूनी शिकंजा, कश्फ, हस्ताक्षर, हिन्दी हाइकु, सहज साहित्य, सौरभ दर्शन, बिजनेस सन्देश, समाज कल्याण, पब्लिक इमोशन, पब्लिक दिलासा, हरिगंधा आदि प्रमुख हैं।
प्रकाशित पुस्तकें:-
सुरेन्द्र वर्मा का साहित्य: परंपरा तथा समकालीन (प्रथम संस्करण 2014) ‘ओस की बॅूंदंे’ काव्य संग्रह (2016)
प्रतिभागी रचनाकार के रूप में - कविता के रंग भाग-2 (2015), भारत की प्रतिभाशाली नारी कवयित्रियां (2016), विहग प्रीति के (2016) सत्यम प्रभात (2016) साहित्य सागर (2016) महेन्द्र भटनागर की कविता: संवेदना और सर्जना (2016) अध्यापक शिक्षण माॅडयूल (2012,13,14)
संस्थाओं द्वारा सम्मान:-
डाॅ. पूर्णिमा के लेखन कार्य एवं सामाजिक शैक्षणिक योगदान हेतु, जिला शिक्षा अध्यापक (2014), आदर्श शिक्षक (2013,15) अन्तर्राष्ट्रीय आदर्श शिक्षक 2015, नारी गौरव (2016) मुक्त लोक सारस्वत (2016) युग सुरभि (2016) अनेको सम्मान से सम्मानित की गई।
डाॅ. पूर्णिमा काव्य संग्रह ‘ओस की बूंदे’ का गहन चिन्तन तथा अवलोकनोपरान्त विविध तथ्य उज्जागर हुए हैं उन पर न्यायोचित विवेचन करने प्रयास किया है जिसका क्रमबद्ध विशलेषण अग्रलिखित है।
सामाजिक समस्याओं का यथार्थ चित्रण:-
मनुष्य एक समाजिक प्राणी है। वह समाज का अभिन्न अंग है। दोनांे की उन्नति एक दूसरे के सहयोग के बिना संभव ही नहीं है। समाज की प्रत्येक क्रिया कलापों का प्रभाव व्यक्ति पर तथा व्यक्ति के क्रिया कलापों का प्रभाव समाज पर अवश्य पड़ता है। मनुष्य समाज से कुछ न कुछ अवश्य ग्रहण करता है तथा समाज में योगदान भी डालता है। कुले के विचाानुसार, ‘‘समाज रीतियों या प्रतिक्रियाओं का ढांचा है। जिनमें प्रत्येक व्यक्ति जीवित है और एक दूसरे के प्रभाव के कारण बढती रहती है एवं पूर्ण अस्तित्व में इस प्रकार की एक रूपता पाई जाती है जो कुछ एक भाग में होता है, वह शेष पर प्रभाव डालता है।’’1 ओडम के मतानुसार, ‘‘दूसरे दृष्टिकोण से समाज को मानव व्यवहार एवं उसी के परिणाम स्वरूप उत्पन्न सम्बंधों की समस्याओं और सामन्जस्यांे से चित्रित किया जा कसता है।’’2
कवयित्री पूर्णिमा राय के काव्य संग्रह ‘ओस की बूंदे’’ में व्यापक रूप से समाजिक समस्याओं का सन्निवेश दिखाई पड़ता है वह व्यक्तिवाद विचारधारा की पोषक नहीं अपितु सामाजिक समस्याओं को यथार्थ के धरातल पर प्रस्तुत करती है उनकी कृतियों में अनेकों ऐसी समस्याओं का निरूपण हुआ है जो हमारे समाज को खोखला बना रही है।
दहेज प्रथा:-
आदिम युग से ही भारतीय समाज पर दहेज प्रथा एक कलंक की भांति विद्यमान है। प्राचीन काल में पुत्री विवाह पर शगुन के रूप में सौगात देने की प्रथा प्रचलित थी जो आधुनिक काल से यह अपना भयावाह रूप धाराण कर चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना कद ऊॅंचा करने हेतु तथा सुसराल में उचित मान-सम्मान प्राप्त होने के लिए दहेज बढ चढ कर देने की प्र्रवृत्ति है। दहेज के लोभियों ने अपनी आॅंख पर पट्टी बांध रखी है। इतने दहेज की मांग करते हैं कि पिता को अपना सर्वस्व लुटाना पड़ता है और अन्ततः आत्महत्या कर लेता है। इतना ही नहीं दहेज लोभियों द्वारा कई बार नवविवाहिता को इतना प्रताडित किया जाता है कि वह स्वयं अग्नि भेट हो जाती है या फांसी के फंदे को झूल जाती है। नारी होने के नाते कवयित्री इस पीडा को अच्छी तरह समझती है । उन्होंने अपनी कृति ‘दहेज’ में इसका कारूणिक चित्र खींचा है -
सुना आंगन रो रहा, बन्द हुए सब साज।
बलि दहेज की चढी, नित नारी की लाज।।
आॅंसूओं की झडी लगी, बिन बादल बरसात।
लाज बाप की रौंद के, चली गयी बारात।।3
कवयित्री वर्तमान युग की शिक्षित एवं जागरूक महिलाओं द्वारा दहेज की निन्दा करती हुई इसका विरोध भी करवाती हंै। दहेज विहीन समाज बनाने हेतु वे सादा एवं अडबंरहीन विवाह कराने के लिए प्रेरित करती है -
प्रण करें सभी बेटियां, मिलकर बेटों साथ।
व्याह सदा सादा करें, मशाल लेकर हाथ ।।4
भ्रूण हत्या:-
भारतीय समाज में कन्या का जन्म एक अभिशाप माना जाता है। इसके पीछे कई पहलू कार्य करते हैं एक पुत्र का वंश चालक, वहशी दरिन्दों से रक्षा तथा दहेज प्रथा जैसी डायन आदि मनःस्थितियों से भयभीत व्यक्ति गर्भ में ही नन्हीं परी का वध करवा देता है ‘बेटी’ कविता में वे इसी सच्चाई का निरूपण करती है।
बेटी मरती देश की, दहशत का महौल
मिले सुरक्षा अब कहाॅं, खुली तंत्र की पोल।।
दुष्ट निगाहें डालते, बोटी-बोटी नोच।
यहीं पाप फल भोगते, गहराई से सोच।।5
‘‘नन्हीं आहें’’ में कवयित्री माॅं की व्यथा को नन्हीं परी के माध्यम से उद्घाटन करती हैं -
मिटा के नाम यूं मेरा, बता मॅंा चैन कितना मिला।
गिरा जो फल डाली से, नहीं फिर कभी है खिला।।
छिपाती दर्द है अपने, लगाती क्यों ना तू गले।
मेरी नन्हीं सी आहें करंे, नैना हिया से गिला।।6
अगर किसी स्त्री ने एक के बाद दूसरी बेटी का जन्म दे दे तो समाज उस पर कटाक्ष कसता है तथा प्रताड़ित भी करता है । जिसका सुन्दर निरूपण निम्न पंक्तियों में करती हैं -
एक बेटी क्या कम थी।
जो दूसरी को पैदा किया।
सून कर ताने लोगों के।
माॅं की जग हंसाई होती है।।7
नशा:-
नशा की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । जो कि भारतीय नवयुवकों को शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर जर्जर तथा खोखला कर रही है। कवयित्री पंजाब प्रांत के नौजवानो में बढ़ रही नशे की लत तथा नशे की छेवी सरिता के प्रति अत्यंत चिन्तित है। नशे के जो घातक परिणाम सामने आते हैं उसका दिग्दर्शन कराती हुई वे लिखती है -
नाश पाप का मूल है, करता पाप विनाश।
शुन्य जीवन जी रहे, खेले दिन भर ताश।।
गुटका बीडी, पान से, पैसा हो बर्बाद।
खाकर मुख छाले पडे, सेहत हो बर्बाद ।।
मुरझाये मुखडे दिखे लगता कैंसर रोग।
सूखी टहनी तन दिखे, दर दर भटके लोग।।8
कवयित्री नशा मुक्त संसार की भी कामना करती हैं तांकि एक स्वस्थ्य समाज, अच्छे नागरिक तथा उन्नत राष्ट्र का निर्माण हो सके -
करे पूर्णिमां कामना, नशा मुक्त संसार।
पढ़े-लिखें बच्चे सभी, दूर करे व्यभिचार।।9
कृषक की दयनीय अवस्था का चित्रण:-
देश का प्रत्येक कृषक खुशहाल जीवन व्यतीत करने तथा मनचाहा फसल की प्राप्ति हेतु दिन रात अत्यंत कठिन परिश्रम करता है। भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है। कई बार कृषकों को मानसून, प्राकृतिक प्रकोप की मार झेलनी पड़ती है। परिणामतः समस्त फसल या तो खराब हो जाती है या पैदावार कम होती है। कृषि ही मात्र आय का साधन होने के कारण उत्पादन न होने के परिणाम स्वरूप उनका जीवन नारकीय तुल्य बन जाता है। अन्ततः वे आत्महत्या हेतु मजबूर हो जाते हंै। कवयित्री अपनी काव्य रचना ‘किसान’ के अन्तर्गत कृषक की दयनीय एव दारूण दशा का कारूणिक चित्र खींचा है -
रोती आॅंख किसान की, देख फसल का हाल।
क्या काटे क्या बेच दे, कैसे गुजरे साल।।
मनचाही फसल मिले, यत्न किये थे लाख।
बेमौसमी बरसात से, होते सपने राख।।
है चिन्ता घर बार की, मन रहता बेचैन।
खाकर गोली नींद की, रतिया पाये चैन।।10
कर्मठ एवं पुरूषार्थ में आस्था:-
डाॅ. पूर्णिमा राय स्वयं एक कर्मठ व्यक्तित्व की स्वामिनी है। पुरूषार्थ एव सतत परिश्रम के द्वारा व्यक्ति बुलन्दियों को छूता है तथा असम्भव कार्य को संभव कर देता है। कवयित्री भग्यवाद में तनिक विश्वास नहीं करती उन का मानना है कि व्यक्ति अपना भाग्य अपने कर्मों के द्वारा सृजित करता है तथा स्वयं भाग्य निर्माता है। अतएव अपनी कृति ‘तकदीर’ में आलस्य का त्याग कर उद्यम करने हेतु प्रेरित करती हैं -
आलस मन का छोड दे, चमके है तस्वीर।
उद्यम से है सुख मिले, बदलेगी तकदीर।।
लेख लिखे जो भाग्य में, कर्मों का है खेल।
दृढ निश्चय से ही सदा, मंजिल से हो मेल।।11
मंजिल को हासिल करने हेतु धौर्यवान होना अत्यंत आवश्यक है। धैर्य ही वह अस्त्र है जो मार्ग में आने वाली बाधाओं एवं रूकावटों में विचलित नहीं होने देती । उदाहरणार्थ -
पथ में बिखरे काॅंटे हो या, फूलों की सौगात मिले।
धैर्य न अपना खोने देना, तारो की बारात मिले।।12
स्वदेशानुराग:-
कवयित्री डाॅ. पूर्णिमा राय की कविताओं में स्वदेशानुराग भी स्थान-2 पर बडी सजीवता एवं स्वाभाविक्ता के रूप में व्यक्त हुआ है। अपनी रचना ‘माॅं भारती’ में भारत माता की वन्दना करती है -
माॅं भारती से हो प्रेम, उसी का अशीष पायें।
सबके दिलों में माॅं का, ध्यान होना चाहिए।।13
ऐसे ही कवयित्री की स्वदेशानुसार रागमयी राष्ट्रीय भावना को उन महापुरूषों के चित्रण में दृष्टिगत होता है जो भारत की आत्मा है जिनके प्रयासों एवं कुर्बानी से भारत माता का सिर ऊॅंचा हुआ तथा भारतीयता गौरवन्वित हुई। समस्त शहीद भारत की आत्मा है ‘शहीद उधम सिंह’ उनकी इसी प्रकार की कृति है -
भक्त सिंह आजाद सभी, उधम जैसे शहीद ।
भरी जवानी में सभी, सहते धूप शहीद ।।
उधम सिंह का जन्म हुआ, वो था गाव सुनाम।
शूरवीर पंजाब ने, किया देश का नाम ।।14
इसी प्रकार उनकी ‘वीर बांकुरे’ तथा ‘रानी लक्ष्मी बाई’ भी राष्ट्रीय भावना से ओत प्रोत है -
मूरत है बिलदान की, रानी लक्ष्मीबाई।
जज्बा सब में है भरा, देश प्रेम सच्चाई।।
बन्दुकें तलवार थी, बचपन के प्रिय खेल।
नारी मन के सामने, हो गये ब्रिटिश फेल।।15
मानवतावादी दृष्टिकोण:-
कवियत्री स्वयं मानवता की साक्षात् मूर्ति हैं । उनके काव्य में मानवतावादी दृष्टिकोण भी दृष्टिगोचर होता है। समाष्टि कल्याण हेतु व्यक्तिगत सुख के तिरस्कार की गाथा प्रस्तुत करती है। उनका मानवतावाद इतना विस्तृत है कि वह यत्र तत्र सर्वत्र दिखाई पड़ता है। राष्ट्रीयता से लेकर अन्तराष्ट्रीयता तक का समाहार उनकी मानवतावादी दृष्टि में दिखाई पड़ती है। वास्तविक्ता तो यह है कि कवयित्री पूर्णिमा की दृष्टि में समस्त विश्व का समाहार दिखाई पड़ता है वे विश्व मानवता की प्रतिष्ठपना करना चाहती है। उनकी दृष्टि ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ वाली है।
हर ओर ही दिखता ख्ुादा है, हर दिल में रब बसता है।
करना दिल से मन पूजा, हर धर्म यही कहता है।।16
‘स्वार्णिम दीपावली’ रचना के अन्तर्गत प्रेम सदभावना, अमन एवम् शान्ति का सन्देश देती है -
भूलकर राग दोष को,
अमन शान्ति के दीप जलायें,
सजाकर प्रेम भावना,
सुखमय दीपावली मनायें।17
हास्य व्यंग्यात्मकता:-
डाॅ. पूर्णिमा राय के काव्य में व्यंग्यात्मकता का पुट भी देखने को मिलता है। इनके व्यंग्य अत्यंत महीन पर अमिट प्रभावशाली है। ‘हंसी’ नामक कृति में वे वर्तमान युग में व्यक्ति के बनावटी मुखौटे, तथा गिरगिट भांति बदलते रूप पर करारा व्यंग्य किया है-
बिन बातों के आती हंसी, हंॅंसता जब कोई जोर से।
ज्यों खरबूजा रंग बदलता, खरबूजे के प्यार में।।
रंग बिरंगे मोबाइल पकडे, घुम रहे सब लोग हैं।
ज्यों बेलन से मार पडी हो, पडोसन के इजहार में।18
राष्ट्रभाषा के प्रति पे्रम:-
हिन्दी शिक्षका होने के नाते मातृ भाषा एवं राष्ट्र भाषा हिन्दी की भी कवयित्री ने महिमा मंडित करती है वे हिन्दी केा सबसे अधिक सुमधुर सरल व सहज भाषा मानती है। हिन्दी के विकास व प्रचार द्वारा ही भारत का उत्थान तथा विकास होगा। ‘प्रिय हिन्दी’ प्रणयन में हिन्दी की महिमा का गुणगान करती हुई कहती है -
मृदुल वाणी हिन्दी है,
प्रेम सत्य भाव भरी,
विदेशी भाषा अंगे्रजी,
ज्ञान होना चाहिए ।
मातृ भाषा का प्रचार हो,
भारत विकास करे,
वैज्ञानिक वर्णमाला,
भान होना चाहिए।19
रिश्तो के बदलते स्वरूप का वर्णनः-
वर्तमान युग के बदलते परिवेश में रिश्तों का स्वरूप भी प्रतिदिन बदलता जा रहा है। अपनत्व की भावना आलोप हो रही है, स्वार्थ प्रबल हो रहा है। स्वार्थ सिद्धि हेतु अपनेपन का नाटक ढांेग करता है। जज्बात, प्रेम, मानवता, मान-सम्मान, बड़ों का आदर, सब लुप्त हो गये कहीं नजर नहीं आते, जिससे जहाॅं लोगांे का जीवन नीरस बन गया वहीं घर के बड़े बुर्जुग अपने आप को जिन्दा लाश समझने लगे । रिश्तों की उड़ती धज्जियों को कवयित्री ने निम्न पंक्तियों में वर्णन किया है-
हर मानव रो रहा , मतलब का व्यवहार।
पशुता हद से बढ गयी, उजड़े है घर बार।।
होते मेल नसीब से, छूट गये वह मोड़।
फना हुए रिश्ते सभी, जज्बातों को तोड़।।
घुट-घुट कर है जी रहे, घर में बूढे़ लोग।
जिन्दा लाशें बन गये, लगते उनको रोग।।20
आज रिश्तों को तार-तार करने में अहम् भूमिका भौतिक लोलुपता, सुख समृद्धि तथा पैसा है -
धन लोभन में हैं बिके, जर जोरू और जमीन
पैसा है सबसे बडा, रिश्ते हुए महीन ।21
नारी शोषण के प्रति आक्रोश:-
शोषण, स्वार्थ लोलुपता के विरूद्ध स्वर मुखरित करने वाली डाॅ पूर्णिमा राय ने इनका डटकर मुकाबला किया। वे समाज की व्यवस्था में समाजस्य और एकरूपता चाहती हैं जिससे स्वस्थ्य समाज का सृजन किया जा सके। अतएव नारी पर होने वाली अत्याचार का डटकर विरोध करती हैं।
यू अफसाना बन गया, डाला जब तेजाब।
पल में बिखरी जिन्दगी, टूटे सारे ख्वाब।।22
कवयित्री को यह बात भी अत्यंत खलती है कि धन, बल की शक्ति की वजह से दोषी पर कोई हाथ नही डालता, वे बेफिक्र व तथा निर्भय होकर घुमते रहते हैं।
निर्भय दोषी घुमते, काले उसके काज।
दब जाये धन राशि से, सत्य करे आवाज।।23
कवयित्री आपनी कृति ‘वेश्या की मनोस्थिति’ में वेश्या के प्रति सहानुभूति प्रकट करती है। नारी कभी वेश्या नहीं बनना चाहती । वह भी तो किसी की बेटी, बहन, पत्नी होती है पर मजबूरियों के सामने वह विवश होती है। इस प्रथा का वह अन्त करना चाहती है। यदि मनुष्य नारी की लाज की रक्षा नहीं कर सकता तो धार्मिक कर्मकांड, पूजा-अर्चन, हवन सब व्यर्थ है। उनका आक्रोश निम्न पंक्तियों मंे दृष्टिगोचर होता है।
बनके वेश्या रो रही, नित नारी की लाज।
धर्म-कर्म पूजा हवन, व्यर्थ सभी है काज।।
तन के भूखे भेडिये, कोख करे बदनाम।
मात कोख ने कब दिया, उसको वेश्या नाम।।24
कवयित्री की आक्रोशता तथा भावनाएं प्रत्येक पाठक के मन को छू जाती है। प्रत्येक व्यक्ति यदि ठान ले कि नारी सभी सम्मानीय है तथा हम नारी पर होने वाले हर अत्याचार का विरोध करेंगे तब ही कहीं जाकर बेटी, बहन एव पत्नी मां को गौरवपूर्ण सम्मान मिलेगा।
भक्ति भावना:-
कवयित्री ने जहां मानव जीवन के बारे में चिन्तन करते हुए आधुनिक जीवन में व्याप्त विषमता, कुण्ठा, निराशा, क्षोम जिजीविषा आदि का चित्रण किया है वहंी परमात्मा की महिमाओं का गुणगान करती है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रत्येक कार्य का शुभारम्भ करने से पूर्व गणेश की वन्दना करते हैं। कवयित्री ने भी यही किया -
दिन चतुर्थी मना रहे, द्वार खडे हैं गणेश।
होती वर्षा ज्ञान की, दूर हुए सब क्लेश।।
शिव उमा के गणेश हैं, सकल धरा आधार।
पूजन गणपति का करे, फैले जग में प्यार ।।25
इसी प्रकार श्री कृष्ण के बाल्य सौन्दर्य एवं मनमोहक रूप का वर्णन ‘श्री कृष्ण’ नामक रचना में करती हंै -
मोहन मूरत सांवरे, मेरे है मनमीत।
जोगन बन हूॅं भटकती, देखी राधा प्रीत ।26
गुरू की महिमा का गुणगान:-
संतो महापुरूषों की भांति कवयित्री ने गुरूओं के महात्म्य का गुणगान करती है। स्वयं एक शिक्षिका तथा परिवारिक वातावरण आध्यात्मिक होने के परिणाम स्वरूप गुरूका सम्मान गुरू की आज्ञा का पालन करने हेतु प्रेरित करना स्वभाविक है। ‘गुरू प्यार’ रचना में गुरू के महानत्म् गुणों को वर्णित किया -
गुरू का सम्मान करें,
आज्ञा का पालन करें,
शीश गुरू चरणों पे,
बार-बार रखिये।27
जहाॅं आज का विद्यार्थी अपने गुरूजनों को सम्माननीय आदर सत्कार नहीं देता वहीं पर कवयित्री पूर्णिमा राय ‘गुरूपूर्णिमा’ के माध्यम से विद्यार्थीयों को सतगुरू के अथाह ज्ञान भण्डार से अवगत कराती है। इतना ही नहंीं गुरू की अनुकम्पा से समस्त विकारों का विनाश, सुखमय जीवन, निर्मल मन स्वस्थ्य शरीर की प्राप्ति होती है। यथा -
कण-कण विद्या हैर मे, चारो ओर पसार।
सत्गुरू ज्ञान लोक में, होते दूर विकार।।
गुरू सेवा के भाव से, सुख मंे रहते लोग।
मन की निर्मल भावना, तन भी दिखे निरोग।।28
सम्प्रदायिकता का विरोध:-
कवयित्री सर्वेभवन्तु सुखिन सर्वेसन्तु निरामया’ की उपासिका एवं पक्षधर है। धर्म कभी मानव को बाटने का कार्य नहीं करता अपितु जोडता है। वास्तव में मानव का बटवारा धर्म के ठेकेदार करते हैं जिसका सुन्दर निरूपण उन्होने ‘सच्चा पीर’ कृति में करती है -
ढांेग पीटते धर्म का, करके अत्याचार।
बांट दिये मानव सभी, फैला हाहाकार ।।29
डाॅ पूर्णिमा राय की प्रथम काव्य संग्रह ‘ओस की बॅंूदों का गहन’ अध्ययनोपरान्त काव्य की जो-जो विशिष्टतांए उभर कर सामने आती है उनको मात्र एक शोध पत्र में व्याख्यायित करना कठिन कार्य है। कवयित्री का यह प्रथम काव्य स्रंग्रह है। इसमें डाॅ. पूर्णिमा राय ने जीवन के विविध पक्षों से सम्बन्धित कविताओं का संकलन किया है। इनकी रचनाओं में समाजिक समस्याओं , राजनीतिक, के साथ-साथ आध्यात्मिक अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्तियां है जो पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं। स्वभाव से सरल एवं सुमधुर भाषी होने के कारण इनके काव्य की भाषा सरल व सहज है जिससे पाठक तादम्य स्थापित कर लेता है। यही कारण है कि समकालीन कवयित्रियों में डाॅ. पूर्णिमा ने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। मेरे विचारानुसार अपनी मृदुलता के परिणामता ही यह भविष्य की कोकिला अवश्य बनेगी ।
सन्दर्भ ग्रंथ सूची
1. एच.सी.कूले, द सोशल प्रोसेस, न्यूयार्क: ड्रासडेन प्रेस, 1941 पृ. 157
2. एच.डबल्यू ओडम, अंडरस्टैंडिग सोसाइटी, न्यूयार्क: द मैकमीलन कम्पनी, 1947
पृ. 9
3. डाॅ. पूर्णिमा राय, ‘ओस की बूॅंदें’ (काव्य संग्रह) लखनऊ: वाॅईस पब्लिकेशन्स, प्रथम
संस्करण 2016, पृ. 35
4. वहीं पृ. 48, 5. वहीं पृ. 44, 6. वहीं पृ. 71, 7. वहीं पृ. 97,
8. वहीं पृ. 30, 9. वहीं पृ. 30, 10. वहीं पृ. 23, 11. वहीं पृ. 40
12. वहीं पृ. 61, 13. वहीं पृ. 52, 14. वहीं पृ. 22, 15. वहीं पृ. 21
16. वहीं पृ. 64, 17. वहीं पृ. 100, 18. वहीं पृ. 86, 19. वहीं पृ. 53
20. वहीं पृ. 38, 21. वहीं पृ. 45, 22. वहीं पृ. 33, 23. वहीं पृ. 44
24. वहीं पृ. 49, 25. वहीं पृ. 15, 26. वहीं पृ. 16, 27 वहीं पृ. 60
28. वहीं पृ. 26, 29. वहीं पृ. 36

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