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भीगी सी तन्हाई

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भीगी सी तन्हाई (कविता) बड़ी सहजता से मुझसे  पूछा- मेरे शुभ चिंतक ने ,आप सपरिवार कैसे हैं? मैंने भी सहजता से कह दिया,सब अलग-अलग हैं,सब अपनी दुनिया में व्यस्त हैं! अपने हिस्से की जिम्मेदारी           को  निभा रही हूं आंखों के आंसुओं को     दुपट्टे की ओट में छिपा रही हूं!! बस दुनियादारी के लिये        टूटे रिश्तों को संजो रही हूं ना चाहकर भी लबों पे       झूठी मुस्कान सजा रही हूं किसी के आने की     आहट का इन्तजार कर रही हूं मत पूछें कि मैं कैसी हूं मैं आज  भी वैसी हूं जैसे सदियों से पूर्णिमा हुआ करती है आसमान में अपने साथ अधूरेपन का एहसास लिये इस गुमान में कि मैं पूर्ण हूं , कब तक जिऊंगी, यह अधूरी जिन्दगी दिखावे की मुस्कान संग पर क्या कहूं लाख कोशिशों के बावजूद भी "पूर्णिमा" अधूरी ही रही भीगी सी सर्द तन्हाई में भीगी सी आंखों में यादों की नमी, आज भी दिल को भिगो रही हैं ,तड़पा रही है डॉ पूर्णिमा राय, पंजाब

याद बहुत ही तुम आते हो

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याद बहुत ही तुम आते हो कहती हूँ मैं दिल की बातें, तुम भी दिल से ही सुनना। याद बहुत ही तुम आते हो ,और नहीं है कुछ कहना।। मैं तो हूँ इक टूटी नौका ,बीच भँवर में अटकी हूँ, मन का चप्पू पाने खातिर, मैं तो हर पल भटकी हूँ । हे प्रिय! ये जीवन अब तो,बोझिल लगता है तुम बिन, मन की लहर किनारा चाहे ,सागर ठगता है तुम बिन। खारे पानी जैसा बनके ,और नहीं मुझको बहना।। याद बहुत ही............................ .................।। दर्पण में मैं अक्स निहारुँ, रूप तुम्हारा दिखता है, धूप छाँव की इस दुनिया में ,प्रेम हमेशा फलता है। पागलपन की हद में देखो , मीरां कहते लोग मुझे, राधा रानी कृष्ण तुम्हारी, इश्क हकीकी रोग मुझे।। डोर टूटती साँसों की अब ,रूह "पूर्णिमा" सँग रहना।। याद बहुत ही............................ drpurnima01.dpr@gmail.com

कागज की नाव

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कागज की नाव  उम्र के नाज़ुक पड़ाव पर सोचा था कि तन्हाई साथ नहीं होगी, पर यह ना पता था कि सिर्फ और सिर्फ तन्हाइयां ही हमेशा साथ रहेंगी। झुकते रहे हम हमेशा इस ख्याल में कि कभी तो सिर उठाकर जी पाएंगे, पर नहीं जानते थे कि हमारा सिर झुकाना कमर का टूट जाना होगा!! तन्हाई भी अक्सर जगा जाती है आत्मविश्वास मन में, कोई ना भी रहे साथ तो क्या फर्क पड़ता है जब यादों का सहारा हो साथ में! हर एक इंसान जरिया है एक दूसरे की खुशी और गमी का, पर अक्सर दौलत के जुनून में यां अपने अहम के जाल में फंस कर भूल जाते हैं कि हम इंसान हैं, भगवान नहीं। और कर बैठते हैं भूल जिससे रिश्ते संभलने की जगह टूटने के कगार पर पहुंच जाते हैं।। रिश्ते तो कागज की नाव की तरह थे पानी में जाते ही खो बैठे अपना अस्तित्व।। drpurnima01.dpr@gmail.com

अखबार की कहानी अखबार की ज़ुबानी

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 अखबार की कहानी अखबार की ज़ुबानी हर सुबह चौंक में एक बड़ी गाड़ी आती है ,जहाँ बहुत से लोग प्रतीक्षा करते हैं...मेरी नहीं !!गंतव्य स्थान पर ले जाने वाली बस,मोटरगाड़ी की!!क्यों ,क्या हुआ?आपको !!यह सुनकर !!कोई था एक जो बेसब्री से मेरा इंतजार करता था ---पढ़ने के लिये नहीं ,जनाब!मुझे बंडल में बाँधकर बेचने के लिये!!उनींदी आँखों में रंग बिरंगे सपने लिये वह हॉकर (अखबार बाँटने वाला)साढे चार बजे मुझे प्राप्त करके गठरी बाँधकर जिस जोश और उत्साह से साइकिल पर जैसे-जैसे पैडल मारता है,वैसे ही मेरे मन का अहम् जाग जाता ।और साइकिल के कैरियर पर लदा हुआ मैं इतना खुश होता कि आज तो मैं दूसरे अखबार को पछाड़ कर सबसे ऊपरी सिंहासन पर सुसज्जित हूँ।पर आह !कितना दर्द !उस रस्सी का सहन किया जो बड़ी मजबूती से मुझे जकड़े हुई थी ! अभी यह सोच ही रहा था कि हॉकर ने झटके से रस्सी खोली और मुझे छोड़कर अन्य अखबार को सबसे पहले बुजुर्ग मीर साहिब जो एक जमाने में अफसर थे,उनके दरवाजे से धड़म से पार करते हुये आँगन में पटक दिया। भई,हम ठहरे ,आज के अखबार जो अभी अपनी अहमियत सिद्ध करने में लगे हुये हैं!वह अखबार जो प्रसिद्ध हैं ,वह कहाँ फटकने ...

दिल से हो जाती है दिल्लगी

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दिल से हो जाती है दिल्लगी    दिल से हो जाती है दिल्लगी  दिमाग लगाकर ना होगी बंदगी ।। दिल कहता है  बस तू रहे हमेशा  पास मेरे दिमाग की मानूं  तो नहीं डूब पाती हूं  ख्यालों में तेरे।। दिल कहता है ,दूर हवाओं में उड़ जा, कहीं दूर सपनों में खो जा। लेकिन दिमाग रखता है मुझे हमेशा  मेरी जमीन से जोड़कर, कर्तव्य अधिकारों में हरसू समेट कर।। जो दिल कहता है वह कर नहीं पाती हूं, दिमाग की बातों में मैं आ नहीं पाती हूं।  अब कैसे दोनों में करुं सामंजस्य , कैसे भुला दूं मैं सारा वैमनस्य।। नारी हूं मैं यह सोच कर संभल जाती हूं,  एक पल के लिये दिल को समझा लेती हूं। दिमाग से में मैं पुरुष भी बन जाऊं  पर वास्तव में नारी हूं , दिल की बातों में कैसे आ जाऊं।  दिल की बातों में मैं कैसे आ जाऊं। डॉ पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका पंजाब

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!Dr.Purnima Rai

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बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!Dr.Purnima Rai अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं(बाल-गीत) अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं सबक याद करवाऊँगा मैं!! थैला मेरे पास है एक जिसमें भरे खिलौने अनेक सब बच्चों में बाँटूगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! भागी आयी रानी मीना मोनू को भी मिला नगीना बन्दर नाच दिखाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! लालपरी सी सुंदर गुड़िया सोनपरी सी चहकी मुनिया मीठा गान सुनाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! लट्टू घूमा शेरा उछला पीपल का हर पत्ता डोला हरियाली को लाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! जादू नगरी जादूगर की सर्कस बढ़िया बाजीगर की चँद सिक्के पा जाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! बच्चो मिलने मुझ को आना दूर कभी मत मुझसे जाना दिल में प्रेम सजाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! जागी बुधिया सोई थी जो टूटा सपना रोई थी वो रोती कली हँसाऊँगा मैं अपनी छड़ी घुमाऊँगा मैं!! डॉ.पूर्णिमा राय

ਫੁੱਲ ਤਾਂ ਫੁੱਲ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇਂ

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ਫੁੱਲ ਤਾਂ ਫੁੱਲ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇਂ (ਕਵਿਤਾ) ਫੁੱਲ ਤਾਂ ਫੁੱਲ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇਂ ਖਿੜਿਆ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਅਧਖਿੜਿਆ ਖੁਸ਼ਬੂ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਕਰਵਾਉਂਦੇ ਨੇ!! ਫੁੱਲ ਤਾਂ ਫੁੱਲ ਹੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇਂ ਟਹਿਣੀ ਨਾਲ ਲੱਗੇ ਹੋਣ ਜਾਂ ਇਨਸਾਨੀ ਕੁੱਖ ਨਾਲ ਕੁਦਰਤੀ ਤੇ ਮਾਨਵੀ ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਖਿਲਾਰਦੇ ਨੇ!! ਫੁੱਲਾਂ ਦੇ ਸੁਹੱਪਣ ਵੱਲ ਵੇਖੀਏ ਜਾਂ ਮਾਨਵੀ ਕੁੱੜਤਣ ਵੱਲ ਖੁਸ਼ੀ ਗਮੀ ਦੇ ਹੰਝੂ ਵਹਿ ਆਉਂਦੇ ਨੇ!! ਦੁੱਖ ਫੁੱਲਾਂ ਦਾ ਸੀਨੇ ਨਾਲ ਲਾਈਏ ਧੀਆਂ ਕੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਨਾ ਮਾਰੀਏ!! ਆਉ ਫੁੱਲਾਂ ਵਾਂਗ ਧੀਆਂ ਦੀ ਖੁਸ਼ਬੂ ਖਿਲਾਰੀਏ ਇਨਸਾਨ ਹੋਣ ਦਾ ਕਰਜ਼ ਉਤਾਰੀਏ!! ਫੁੱਲਾਂ ਨੂੰ ਖਿੜਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਨਾਂ ਤੋੜੀਏ ਭਰੂਣ ਜਿੰਦੇ ਜੀ ਨਾਂ ਸਾੜੀਏ!! ਭਰੂਣ ਜਿੰਦੇ ਜੀ ਨਾਂ ਸਾੜੀਏ।!! Dr.Purnima Rai

हिन्दी भाषा : भावात्मक एकता की आधारशिला (14 सितंबर हिंदी दिवस विशेष )

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  हिन्दी भाषा : भावात्मक एकता की आधारशिला   (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर ) किसी राष्ट्र की एकता व संस्कृति के शक्तिशाली बनने का माध्यम भाषा है। भाषा के उत्थान एवं प्रचार में ही पूरे राष्ट्र का कल्याण समाहित है।मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के सन् 1998 ई. के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार हिन्दी को तीसरा स्थान दिया गया।सन् 1997 में सैन्सस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषा ओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन्1998 में यूनेस्को प्रश्नावली भारतीय सरकार के केंद्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफैसर महावीर सरन जैन को भेजी गई।जिस आधार पर यह विश्व स्तर पर स्वीकार्य है कि मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से हिन्दी का स्थान संसार की भाषाओं में द्वितीय है। * * * * * * * * * * * चमके है बिंदी सदा ,सुन्दर भाल नारी के  बनी देश भारत की,पहचान हिंदी से।। * * * * * * * * * * * विश्व के लगभग 20वीं शती के अंतिम दो द...

ਪੰਜਾਬੀ ਅਣਡਿੱਠਾ ਪੈਰਾ : ਆਓ ਗਿਆਨ ਵਧਾਈਏ

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  ਪੰਜਾਬੀ ਅਣਡਿੱਠਾ ਪੈਰਾ ( 12 NOV COUNTDOWN ) 1. ਹੇਠਾਂ ਲਿਖੇ ਪੈਰੇ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਪ੍ਰਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਸਹੀ ਉੱਤਰਾਂ ਦੀ ਚੋਣ ਕਰੋ : ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਧਰਤੀ ਥੱਲੇ ਪਾਣੀ ਲੱਭ ਲਿਆ ਹੈ ਤਾਂ ਹੀ ਉਹ ਦਰਿਆਵਾਂ ਦੇ ਕਿਨਾਰਿਆਂ ਤੋਂ ਪਰ੍ਹੇ ਪਿੰਡ ਵਸਾਉਣ ਦੇ ਯੋਗ ਹੋਇਆ। ਜਦੋਂ ਉਸਨੇ ਅੱਗ ਬਾਲਣੀ ਸਿੱਖ ਲਈ ਤਾਂ ਹੀ ਉਸਨੇ ਰਿੰਨ੍ਹਣਾ-ਪਕਾਉਣਾ ਆਰੰਭ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਅਨਾਜ ਵੀ ਉਸਦੇ ਆਹਾਰ ਦਾ ਭਾਗ ਬਣਿਆ। ਜਦੋਂ ਉਸਨੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਨਵੇਂ ਸਰੋਤ ਲੱਭ ਲਏ ਤਾਂ ਉਸਨੇ ਟਿਕਾਉ ਜੀਵਨ ਜਿਉਣਾ ਆਰੰਭ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਜਦੋਂ ਉਸਨੇ ਜਾਨਵਰਾਂ ਦਾ ਸੁਭਾਅ ਸਮਝ ਲਿਆ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਕਰਨ ਦੇ ਨਾਲ਼-ਨਾਲ਼ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਜਾਨਵਰ ਸ਼ਕਤੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਹਿੱਤ ਲਈ ਵਰਤਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਪੈਦਲ ਚੱਲਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਸਨੇ ਘੋੜੇ ਆਦਿ ਦੀ ਸਵਾਰੀ ਕਰਨੀ ਆਰੰਭ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਅਤੇ ਇੱਕ ਥਾਂ ਤੋਂ ਦੂਜੀ ਥਾਂ ਜਾਣ ਦੀ ਰਫ਼ਤਾਰ ਵਿੱਚ ਵਾਧਾ ਕੀਤਾ। ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਵਾਰਸ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਦੀ ਇੱਛਾ ਨਾਲ਼ ਉਸਨੇ ਵਿਆਹ ਨਾ ਦੀ ਸੰਸਥਾ ਉਸਾਰੀ ਅਤੇ ਰਿਸ਼ਤਾ-ਨਾਤਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਹੋਂਦ ਵਿੱਚ ਆਇਆ। ਇੱਕ ਥਾਂ ਟਿਕ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਰਸਮ-ਰਿਵਾਜ, ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤੇ ਅਤੇ ਮੇਲੇ-ਤਿਉਹਾਰ, ਸ਼ਗਨ-ਅਪਸ਼ਗਨ, ਸਾੜਾ-ਈਰਖਾ, ਮੇਲ-ਮਿਲਵਰਤਨ ਆਦਿ ਹੋਂਦ ਵਿੱਚ ਆਏ, ਇਵੇਂ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਮਨੁੱਖੀ ਸੱਭਿਅਤਾ ਦੀ ਮਾਂ ਹੋ ਨਿਬੜੀ। ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਵਿਕਾਸ ਨਾਲ਼ ਹੀ ਪਿੰਡ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਹੋਇਆ। ਪਿੰਡ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਉਦੋਂ ਹੀ ਸੰਭਵ ਹੋਇਆ ਜਦੋਂ...

अपठित गद्यांश :आओ NAS तैयारी करें

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   अपठित गद्यांश :आओ NAS तैयारी करें 1.निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर दें: - भारत के वीर देश की आज़ादी की रक्षा की खातिर सदैव कुर्बान होने को लालायित रहते हैं। उनका ध्येय मात्र राष्ट्रीय पुरस्कार या सम्मान पाना ही नहीं होता बल्कि वे देश व देशवासियों की सुरक्षा के लिए शहीद होने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। ऐसे ही बुलन्द हौसले वाले, अटूट साहसी, जिन्हें मौत का डर न था। वे थे स्काड्रन लीडर अनिल शर्मा उर्फ 'नीलू'। बाल्यकाल से ही दृढ़ निश्चयी नीलू अपनी बड़ी बहन 'शुभला' का दाखिला करवाने गए पिता से जिद्द पर उतर आए कि उन्हें भी स्कूल में भर्ती करवाया जाये। भला बाल हठ व दृढ़ निश्चय के सामने कौन नहीं झुकता ? पिता को उनका दाखिला चार वर्ष की आयु में ही प्रथम कक्षा में करवाना पड़ा। प्रश्न:- 1. अनिल शर्मा कैसे व्यक्ति थे? * क)अटूट साहसी ख) बुलन्द हौसले वाले ग)जिन्हें मौत का डर न था घ)उपरोक्त सभी .प्रश्न :-2भारती य जवान किस बात को लालायित रहते हैं? * क) सम्मान पाने को ख) पुरस्कार पाने को ग) देश की खातिर कुर्बान होने को घ) स्काड्रन लीडर बन...