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हिंदी दिवस (गीत)

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 हिंदी दिवस (गीत)   (डॉ.पूर्णिमा राय) नाच लो गा लो मौज मना लो       हिंदी दिवस फिर आया है। भारत देश की सुप्त आत्मा        को जगाने आया है।। हिंदी में हस्ताक्षर करना        सब का ये ही कहना है, हिंदी बोली मीठी लगती        हिंदी दिल में रखना है, पंजाबी,अंग्रेजी,हिन्दी का        भेद मिटाने आया है। नाच लो गा लो मौज मना लो      हिंदी दिवस फिर आया है...।। हिंदी का अखबार पढ़ो और      हिंदी ज्ञान बढ़ाओ तुम, हिंदी कविता,लेख लिखो और  मैगज़ीन में छपवाओ तुम, शुद्ध हिंदी बोलें और समझें  जग को सिखाने आया है। नाच लो गा लो मौज मना लो      हिंदी दिवस फिर आया है...।। हिंदी इतनी नहीं है मुश्किल  जितनी हमको लगती है, भारत देश के भाल पे देखो  हिंदी बिंदी सजती है, चौदह सितम्बर हिंदी दिवस की याद दिलाने आया है। नाच लो गा लो मौज मना लो      हिंदी दिवस फिर आया है...।। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका आलोचना पुरस्कार विजेता...

वह औरत

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  वह औरत ( लघुकथा) उफ!कभी सात बजे आ धमकता तो कभी 10बजे!   रात के साढे आठ बज गये हैं !और यह दूध वाला  क्या करूँ!बिना दूध के गुजारा भी तो नहीं होता !मैडम जी,दूध ले जाओ !आवाज़ सुनकर लतिका थोड़ी आग बबूला हुई बर्तन लेकर दूध लेने चली गई।सड़क के दूसरी ओर से एक औरत हाथ में बर्तन लिये और साथ में शायद तीन बच्चियाँ जो नंगे पाँव तथा जिनके जिस्म पर ना मात्र के ही वस्त्र थे,उम्र यही 6साल ,4साल और 2 साल के पास होगी।संग लिये ऊँची-ऊँची बोलती हुई,तुमने मुझे दूध क्यों न दिया ।मेरे घर के बाहर तू रुका क्यों नहीं !बता ,जल्दी बोल!उसे इस तरह बात करते हुये लतिका दूध डलवाते हुये एक नज़र उस औरत पर  डालती,फिर एक नज़र दूधवाले की ओर  !आप लोग हमें तीन महीने हो गया,दूध का पैसा न दिया !--दूधवाला बोला! अरे,वह तो मेरी अम्मा का हिसाब-किताब है !मैं तो यहाँ परसों से आई हूँ ।मैंने तो जब भी आधा किलो दूध लिया,पैसे दिये थे न!वह मिन्नत की स्थिति में कह रही थी..चल डाल दे दूध!पर दूध वाला नहीं मान रहा था!इसी बीच लतिका चुपचाप घर के भीतर आ गई।उनके आपसी झगड़े को वह महसूस कर रही थी।किचन में आकर चार पैकेट बिस्किट के ल...

आँचल (लघुकथा)

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आँचल (लघुकथा) स्कूल लगने की घंटी के साथ ही सब छात्र-छात्राएं कतारों में खड़े होकर ईश वंदना करने लगे।राष्ट्र गान जन गण मन की मधुर धुन के बजते ही अदब से सभी  बिना हिलजुल के खड़े हो गये।अब आपके सामने नवम् कक्षा की आँचल आज का विचार पेश करेगी, अध्यापक के संबोधन को सुनकर सब तालियाँ बजाते हुये आँचल के स्टेज पर आने की प्रतीक्षा करने लगे। एक साँवली सी लड़की अपनी मधुर आवाज़ में बोली,परिवार !! और साथ ही रो पड़ी!!सभी हतप्रभ से  आँचल को निहारने लगे ।ये लड़की तो सदैव हँसती खिलखिलाती नजर आती थी,हरेक कार्य में निपुण ,आज आँसुओं भरी आँखों से बस एक ही शब्द परिवार कहकर चुप क्यों हो गई।सुबकती आँचल ने आँचल से भीगी आँखें पोंछते कहा,मेरा परिवार बिखर गया।मेरे दादा जी ने पापा को घर से निकाल दिया ।दादा जी के बार-बार समझाने पर भी पापा ने मम्मी को सबके सामने मारना,गाली गलौच करना बंद न किया था।और शराब पीने से परहेज न किया।अचानक प्रिंसीपल ने पीछे से आँचल के कँधे पर हाथ रखकर उसे धैर्य बँधवाते कहा,तुम्हारे दादा जी ने तुम्हारे पिता को सबक सिखाने के लिये ऐसा किया है।तुम घबराओ मत! स्कूल एक मंदिर है और हम सब यहाँ एक पर...

पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन by Dr Purnima Rai

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पावन प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन by  Dr Purnima Rai रक्षा बन्धन आ गया, बहना का ले प्यार। दिवस 'पूर्णिमा' कर सजे,रक्षाबंधन तार।। आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तो को मजबूती प्रदान करने का पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतीय समाज में व्यापकता और गहराई से समाए हुए इस पर्व के दिन लड़कियां और महिलाएं पूजा की थाली सजाकर अपने भाई को राखी बांधने के लिए जाती है ।अभीष्ट देवता की पूजा करने के बाद रोलिया हल्दी का टीका लगाकर भाई की आरती उतारती है और दाहिनी कलाई पर राखी बांधती हैं ।इसके बदले में भाई बहन की रक्षा का वचन लेता है और उसे उपहार में कोई धनराशि या कोई अमूल्य वस्तु प्रदान करता है। रक्षाबंधन तार, राखियाँ प्यारी चमके । शाश्वत केवल प्यार, बहन के मुख पे दमके। राखी के रंग-बिरंगे धागे बहन-भाई के रिश्ते को दृढ़ता प्रदान करते हैं ।बहन-भाई के प्रेम का सूचक यह त्यौहार देशकाल, भाषा-जाति की सीमाओं से परे गुरु- शिष्य कि रिश्ते को भी राखी के पवित्र धागों में बांधता है। कहते हैं जब कभी शिष्य गुरुकुल से शिक्षा लेकर विदा होता था तो शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद पाने के लिए अ...

भूखा बचपन

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भूखा बचपन (गीत )by Dr.Purnima Rai भूखा बचपन आज सड़क पर रुलता है  प्यार किसी से उन्हें नहीं क्यों मिलता है निर्धन के घर जन्म हुआ उसका क्या दोष चार पैसे उसे दे दो न खाली होगा कोष मां बापू के बिन ही वह तो पलता है भूखा बचपन आज सड़क पर रुलता है  प्यार किसी से उन्हें नहीं क्यों मिलता है अपने बच्चों की ख्वाहिश हर कोई पूरी करे बाल बने मजदूर किसी को क्यों न दिखे नंगे पांव धूप में तन जले चलता है भूखा बचपन आज सड़क पर रुलता है  प्यार किसी से उन्हें नहीं क्यों मिलता है कुछ तो बेबस कुछ जबरन मजदूर हुये पढ़ने का न मोल वे थककर चूर हुये 'पूर्णिमा' सच्चे कर्म से आंगन फलता है भूखा बचपन आज सड़क पर रुलता है  प्यार किसी से उन्हें नहीं क्यों मिलता है डॉ पूर्णिमा राय  शिक्षिका एवं लेखिका  पंजाब

शब्दों के मोती (अन्तर्राष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता) - मिला प्रशंसा- पत्र (डॉ.पूर्णिमा राय)

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शब्दों के मोती (अन्तर्राष्ट्रीय काव्य प्रतियोगिता) मिला प्रशंसा- पत्र (डॉ.पूर्णिमा राय) यह जीवन एक प्रतिस्पर्धा है ,प्रतियोगिता है। प्रतिपल इंसान किसी न किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सदैव आगे बढ़ता रहता है। मंजिल को पाने की ललक उसके कदमों की रफ्तार को सदैव तीव्र करती रहती है ।कभी उबड़-खाबड़ रास्ते आयें, कभी समतल मैदान आयें तो भी इंसान अपने लक्ष्य के लिए निरंतर कार्य करता ही रहता है। लेखन कार्य भी एक तरह से साहित्यिक मंजिल को पाना ही है। साहित्यिक दिशा में खुद को बेहतरीन करने में प्रयासरत रहने वाला साहित्यकार नित्य नई मंजिल को पा लेता है। प्रतियोगिताएं जीवन में हमें यही सिखाती है कि आगे बढ़ो, जिंदगी रुकने का नाम नहीं है ,इसी लक्ष्य से मैं भी निरंतर साहित्य क्षेत्र में होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लेती रहती हूं। स्टोरीमिरर साहित्यिक वेबसाइट, वेब मैगजीन पर अपनी रचनाओं को निरंतर प्रकाशित करना, उस में होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लेना मुझे बहुत अच्छा लगता है। चाहे मुझे प्रथम स्थान मिले या ना मिले, प्रशंसा पत्र मिले या ना मिले इसका मुझे कभी भी लोभ नहीं रहा है और ना ही रहेगा। पर जब भी ...

गवाही (लघुकथा)

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 गवाही (बाल दिवस विशेष) आज 14नवंबर "बाल दिवस" के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस दिन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू जी का जन्म दिन है।जो बच्चों से बेहद प्यार करते थे।बच्चे प्यार से उनको चाचा नेहरू पुकारते थे।गुलाब के फूल जैसे बच्चों के लिये एक दिन मनाने की पुण्य भावना को चिरस्थाई रखने के लिये ही 14 नवंबर का दिन नियत किया गया था।कहते हैं बच्चे भगवान का रूप हैं।शायद सच भी है।पर समय परिवर्तन के साथ -साथ बच्चों के प्रति समाज के लोगों के बदलते व्यवहार को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।बाल मजदूरी की समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है चाहे समाजसेवी संगठन इस दिशा में विशेष सहयोगात्मक रूख अपना रहें हैं फिर भी आये दिन सड़कों पर चार पाँच साल से लेकर 13-14 वर्ष के बच्चे छोटी-छोटी चीजें --मूँगफली,चने,झंडे,गुब्बारे ,दिये ,समाचारपत्र आदि बेचते नज़र आ ही जाते हैं।बीते दिनीं हम लोग कार से जा रहे थे ।रास्ते में अचानक जमीन पर एक नुक्कड़ में छोटी सी तरपाल डालकर एक अस्थाई दुकान बनी हुई थी जिसमें मूँगफली,चने गर्म करके बेचे जा रहे थे।सर्दी आ रही है ,सोचा थोड़ी गर्म मूँगफली खरीद ली जाये।यही ...

स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है

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स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है  अंध श्रद्धा को भक्ति एवं धर्म का नाम देना उचित नहीं।धर्म यह भी नहीं कि भेड़चाल की तरह यां पारिवारिक संस्कारों में मिली धार्मिक विरासत के आगे बिना सोचे समझे ,जाने बगैर मस्तक झुकाओ और घुटने टेक दो।ठप्पा लगा..कहाँ है ठप्पा...आमिर खान की फिल्म "ओ माय गॉड" में बेबाकी से धार्मिकता पर किया आक्षेप आज के संदर्भ में कितना उचित था यां अनुचित ...सोचने का प्रश्नहै।पर तब भी विवाद हुआ ..लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँची ...कहकर आक्षेप लगे।सदैव देर बाद ही बात समझ आती है शायद भोले भाले लोगों को,समाज के नेताओं को ,सरकारों को,,धर्म के ठेकेदारों को ..तभी तो 15 साल बाद किसी निर्णय पर पहुँचे।यहाँ मुद्दा किसी धर्म गुरु का,नेता का,प्रशासन का,व्यवस्था का यां प्रबुद्ध वर्ग यां सामान्य जन का ...किसी का भी हो ...शीघ्र स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है ..तभी तो आगजनी,हिंसा,पथराव,.मृत्यु का तांडव न जाने क्या क्या ......देखती है आँखें...और दुखी होती है साफ आत्मायें!!  स्वार्थ का कीड़ा खेल खेलता है सब....अगर हम कहें कि सब एक जैसे हैं तो यह धारणा गल्त होगी।साधारण तौर पर किसी एक के कु...

सेल्फी और सेल्फ(डॉ.पूर्णिमा राय)

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सेल्फी और सेल्फ आधुनिक स्मार्टफोन युग में दूसरों के समक्ष अपने सेल्फ के बाह्य रूप को प्रस्तुत करने का प्रस्फुटन सेल्फी है।मैं क्या हूँ और क्या दिखाना चाहता हूँ ?मैं कैसा हूँ और कैसा दिखता हूँ?इसी ऊहापोह में एवं एकान्त जीवन की घुटन में बाहरी अपनेपन और खुशी तथा आनंद के पलों को खोजते-खोजते मानव इतना मशीनी हो गया कि उसे इन्सानों से अधिक मोबाइल एवं इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों - ------- फेसबुक,वात्सैप,इनस्टाग्राम इत्यादि से अत्यधिक लगाव हो गया।ये लगाव एक सीमा तक जहाँ आनंददायक था,वहीं सीमा के अतिक्रमण होने पर यह मानव की असमय मौत का साधन भी बन गया। हिंदुस्तान की आबादी 133 करोड़ के आस पास आ चुकी है और देश में मोबाइल की संख्या भी इसी के आस-पास है । देश में इस समय लगभग 120 करोड़ मोबाइल लोग का प्रयोग कर रहे हैं।लगभग 9.30 करोड़ सेल्फी हर दिन दुनिया में ली जाती है । भारत में ही नहीं हर देश में इसका प्रचलन खूब हो रहा है आज चहुँ ओर नजर दौड़ायें तो सेल्फी की भरमार ही नजर आ रही है। एक सर्वे केअनुसार पुरुष 20 सेकेंड से ज्यादा समय के लिये भी मोबाईल से दूर नहीं रह सकते। परन्तु महिलाओं की स्थिति इस मामले में...

बारिश (हास्य व्यंग्य)

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बारिश (हास्य व्यंग्य) असमता के पाटों के बीच, पिसता जीवन करे गुहार बारिश की बूँदों से टपके,दर्द टीस और हाहाकार!! न जाने क्यों ?लोग यह नहीं सोचते कि हमारा इस तरह का बर्ताव एक तो हमारे खुद के लिये हानिकारक है और दूसरा अन्य व्यक्तियों को ,भी इससे नुक्सान होगा।सड़कें कच्ची थी !नहीं, नहीं,पक्की थी ।अपने ऊँचें घरों को अन्य लोगों के घरों से श्रेष्ठ सिद्ध करने की लालसा ,चाहना ने पक्की सड़क को मिट्टी से ढककर कच्चा बना दिया था।पानी का पाईप बाहर खुली सड़क पर ओवरफ्लो होता, टैंकी भरने पर पानी कभी किसी राही को नहला देता,तो कभी किसी गुज़रती गाड़ी को नहला देता। कहीं झगड़ा न हो जाये,दो चार बार पुलिस भी आ चुकी थी।अब जिसको मुश्किल लगती ,वह खुद बात करे ,औरों को क्या।सबको अपना गेट साफ चाहिये था।हाँ ,भई  साफ-सफाई घर की तो होनी ही चाहिये ।गली-मुहल्ले का रास्ता कीचड़ सना रहे ,हमें क्या!हम तो पैंट टाँग कर जूते हाथ में पकड़ कर निकल ही जायेंगे ।वैसे बलि का बकरा कौन बने! ना जी,हम तो दूसरों के खाली पड़े प्लाट से ईंटें चोरी कर सकते हैं,मिट्टी उठाकर घर का आँगन ऊँचा कर सकते हैं ,हमसे तो न होगा ,किसी को जाकर कहना कि अपना प...